Under Guidance of PS Malik

Rajkumar Kejri

Rajkumar Kejri

एक आवत एक जात

कबीर के दो दोहे हैं

पतझड़ आ गया है। पत्ते झड़ने लगे हैं। नीचे गिरते हुए पत्ते बहुत डिप्रैस्ड फ़ील कर रहे हैं। एक पत्ता आखिरकार कह ही उठता है

पत्ता बोला पेड़ से सुनो वृक्ष बनिराइ

अबके बिछड़े ना मिलैं दूर पड़ेंगे जाइ।।

सनातन वृक्ष के लिए पत्तों का आना जाना उतना सीमित अनुभव नहीं है। वह अनेक पतझड़ और वसन्त देख चुका है। वह इस निरन्तरता को पहचानता है। वृक्ष ने उत्तर दिया

वृक्ष बोला पात से सुन पत्ते मेरी बात

इस घर की यह रीत है एक आवत एक जात।।

अतः यहाँ से इति AAP कथा – राजकुमार केजरी

rajkumar kejri

भारतीय राजनीति को गौर से देखने वाले जानते हैं कि राज्यों का भारत में विलय, चीनी आक्रमण, नेहरू-निधन, कामराज प्लान, कांग्रेसी सिंडिकेट, संविद सरकारें और इंदिरा का उदय भारतीय राजनीति के मील के पत्थर तो हैं लेकिन युगाँतरकारी घटनाएँ नहीं है। इन घटनाओं पर भारतीय इतिहास ने करवटें तो बदली परन्तु राजनीति की धमनियों में वही खून दौड़ा किया।

लेकिन सन् पिच्छत्तर की इमरजैंसी ने जैसे पिछले पाँच हजार साल से सोते भारत को झकझोर दिया था। विपक्ष ने इमरजैंसी की अ-लोकताँत्रिक छवि की बहुत आलोचना की है। काँग्रेस ने उस निर्णय का बचाव किया है। इस राजनीतिक प्रशँसा-आलोचना से परे उस इमरजैंसी ने भारत के जनमानस को सोते से जगाया था। जागने पर जनता ने अँगड़ाई ली और अँगड़ाई लेते लेते 1977 आ गया था। तब भारत की उस निरीह जनता ने जो पाठ महात्मा गाँधी से पढ़ा था उसे दोहरा दिया। एक स्थापित साम्राज्य 1947 में चूर हुआ था दूसरा तीस बरस बाद 1977 में हो गया। वह भारतीय संदर्भों में हुई एक रक्तहीन रूसी क्राँति थी। तत्कालीन लेखों में लिखा गया कि 60 बरसों के बाद रूसी क्राँति भारत में घटित हो गई थी। परन्तु यह इतनी भर ना थी। रूसी क्राँति एक दिशा में चलने वाली रेल थी तो भारतीय क्राँति उससे अधिक व्यापक और गहन अर्थों वाली थी। इसके ये अर्थ और व्यापकता आने वाले वर्षों में साबित हुए। इसलिए भारत के राजनीतिक इतिहास को लिखते समय 1975 का साल बिना किसी हानि के एक रेफरैंस प्वाइँट के रूप में लिया जा सकता है। यहाँ इस लेख में समय की गणना साल 75 से ही की गई है।

… …

केजरीवाल ने जनता से वादे किये। उन्होंने जनता को कहा कि पुराने राजनीतिज्ञों का यकीन ना करो क्योंकि वे झूठ बोलते हैं। उन्होंने बहुत बेझिझक अँदाज में कहा कि वर्तमान राजनीति में जो लोग उनके साथ हैं सिर्फ वे ही ईमानदार हैं शेष सब बेईमान हैं। इतना ही नहीं उन्होंने एक ऐसी शब्दावली का प्रयोग किया जो बिल्कुल नई थी और जिसे याद करने के लिए भी दोहराया नहीं जा सकता। तमाम परिभाषित रूपों को तोड़ दिया गया। उनके साथ चलने वाले और स्वयँ को उच्च साहित्यकार कहने वाले लोगों ने तो ऐसे ऐसे भाषिक प्रयोग किये कि मदिरा पान के बाद सड़क पर लड़ने वाले यौद्धाओं ने भी दाँतो तले उँगलियाँ दबा ली थीं। समसामयिक सिनेमा का प्रभाव कहये या कुछ और कहिये लोगों को यह केजरीवाल – आल्हा बहुत पसँद आई और उन्होंने उसे बहुत ध्यान और चाव से सुना। अपने वोट के रूप में सकारात्मक उत्तर भी दिया। आज केजरीवाल बाबू पर सत्ता का चँवर डुलाया जा रहा है।

जैसा 1977 में भारतीय-काँग्रेस ने महसूस किया था वैसा ही 2013 में दिल्ली-काँग्रेस ने महसूस किया। अन्य विपक्षी दल भाजपा सदमा, राहत, हैरानी, घात और किंकर्त्तव्यविमूढ़ता (दुविधा) के मिले जिले भावों से ग्रस्त है। उससे ना बोलते बन पड़ रहा है और ना ही चुप रहते।

… …

ऐसे में नीले आसमान में सफेद घोड़े पर बैठा यह केजरीवाल नाम का राजकुमार जिस जादू की छड़ी को हिला कर भारत के समाज को बदलने की घोषणा कर रहा है वह कितनी विश्वसनीय है यह एक ऐसा सदका है जिस आने वाला समय बहुत जल्द जनता के सामने उतारने वाला है। लेकिन इसे सिर्फ़ समय के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता। इसका क तार्किक आकलन आवश्यक है।

THE COMPLETE ARTICLE IS AT THE LINK BELOW:

http://worldview.psmalik.com/rajkumar-kejri/

http://psmalik.com/2013-06-11-19-06-36/21-interesting/198-rajkumar-kejri

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Tag Cloud

%d bloggers like this: